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छत्तीसगढ़

बागियों में इतना दम है तो राजनीतिक पार्टियां टिकट काटती ही क्यों है?

इंदर कोटवानी

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नामांकन दाखिल करना शुरू कर दिए हैं, दूसरी तरफ बागी भी अपना तेवर दिखा रहे हैं,ऐसे बागियों का दोनों पार्टी के प्रमुख नेता मान मनव्वल कर रहें हैं। बागी बयान जारी करके अपने महत्व को बता रहे हैं, कहते हैं कि कार्यकर्ता और जनता चाहती है कि वे चुनाव लड़े लेकिन पार्टी से बंधे होने के कारण वे ऐसा नहीं कर रहे हैं, यदि पार्टी उनके महत्व को नहीं समझती है तो वे निर्दलीय भी चुनाव लड़ सकते हैं? बागी कहते हैं कि जनता और कार्यकर्ताओं का उन पर जबरदस्त दबाव है। अब सवाल उठता है कि जनता और कार्यकर्ताओं का इतना अधिक दबाव है तो फिर वह सीधे-सीधे चुनाव क्यों नहीं लड़ते हैं क्यों इस बात का इंतजार करते हैं की पार्टी के नेता उन्हें मनाने आएंगे, दूसरी तरफ सवाल यह भी उठता है कि पार्टी के नेता ऐसे बागियों को मनाने क्यों जाते हैं? यदि बागी इतने महत्वपूर्ण और प्रभावशाली है तो फिर उनकी टिकट काटते ही क्यों है?

लोकसभा हो या विधानसभा का चुनाव पार्टियां जब टिकट परिवर्तन करती है, तब लंबे समय से सत्ता सुख भोगने वाले विधायक-सांसद पार्टी को ब्लैकमेलिंग करने लगते हैं, बागी होकर अपने ही पार्टी को क्षति पहुंचाने की कोशिश करते हैं, टिकट नहीं मिलने पर कोई एक पार्टी से इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और जब दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं तो बयान जारी करते हैं कि उनका दम घुट रहा था जिस पार्टी में वे शामिल होते हैं, वहां से उनको टिकट मिल जाती है, जबकि लंबे समय से कार्य करने वाले वफादार कार्यकर्ता पार्टी फैसले का सम्मान करते हुए पार्टी को मजबूत करने में लग जाते हैं। मलाई खाने वाले नेता पार्टी बदल- बदल कर मलाई ही खाते रहते हैं। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में यही हो रहा है।

अंतागढ़ विधानसभा के कांग्रेस विधायक अनूप नाग ने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया है उसे इस बार टिकट नहीं दी गई है इस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने अनुप नाग को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है। सरायपाली के कांग्रेसी विधायक पार्टी का टिकट नहीं मिलने के कारण अजीत जोगी की पार्टी से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। भारतीय जनता पार्टी के धरसीवा क्षेत्र से विधायक रहे देवजी भाई पटेल ने जनता और कार्यकर्ता के दबाव का हवाला दिया है इस बार उन्हें भाजपा से टिकट नहीं दी गई है। ऐसे बहुत सारे नेता है जिन्हें अगर टिकट नहीं मिलती है तो वह या तो निर्दलीय लड़ते हैं या किसी दूसरी पार्टी में चले जाते हैं या फिर
भीतरघात करते हैं। वे भूल जाते हैं कि इतने दिनों तक पार्टी ने उन्हें सम्मान दिया था, जब किसी और को मौका मिलता है तो ऐसे लोग पार्टी को ब्लैकमेलिंग करने की कोशिश करते हैं। पार्टी नेता भी ऐसे लोगों को मनाने में लग जाते हैं।

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