Sunday, November 30, 2025
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बकरीद पर मस्जिदों में अदा हुई नमाज, इबादत के बाद शुरू हुआ कुर्बानी का सिलसिला

रायपुर-भिलाई -तिल्दा नेवरा ..

कुर्बानी के जज्बे के साथ ईद-उल-अजहा पर आज शनिवार को अल्लाह की बारगाह में लाखों सिर सजदे में झुके. प्रदेश भर में बकरीद पर अकीदतमंदों ने नमाज अदा की. राजधानी रायपुर,बिलासपुर,भिलाई दुर्ग,तिलदा नेवरा में ईद-उल-अजहा की नमाज अदा की गई.

कुर्बानी के जज्बे के साथ ईद-उल-अजहा पर शनिवार को अल्लाह की बारगाह में लाखों सिर सजदे में झुके. प्रदेश भर में बकरीद पर अकीदतमंदों ने नमाज अदा की.सेक्टर 6 भिलाई में ईद-उल-अजहा की सबसे बड़ी जमात जमा मस्जिद में अदा की गई. सुबह 8 बजे इमाम ने नमाज अता कराइ अय्यपा नगर जुनवानी रोड स्थित फलक नुमा मस्जिद में  मौलाना की इमामत में ईद-उल-अजहा की नमाज सुबह 8 बजे अदा की गई.तिल्दा ईदगाह में सुबह 8 बजे नमाज अदा की गई

राजधानी रायपुर की मस्जिदों में सुबह साढ़े  7 बजे से ही ईद उल अजहा की नमाज अदा की गई. ईद उल अजहा की नमाज सकुशल संपन्न कराने के लिए पुलिस प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद नजर आई. भारी संख्या में मस्जिदों में मुस्लिम समाज के लोग पहुंचकर ईद उल अजहा की नमाज अदा कर देश में अमन और शांति के साथ भाईचारे की दुआ मांगी. नमाज के बाद एक दूसरे को गले लगाकर ईद की बधाई भी दी.

मुसलमानों के लिए आज का दिन विशेष महत्व रखता है। इस्लाम धर्म में बकरीद के दिन को बलिदान का प्रतीक माना जाता है। बकरीद में बकरा की कुर्बानी दी जाती है। लेकिन उससे पहले मस्जिद में जाकर बकरीद यानी ईद-उल-अजहा की नमाज की अदा की जाती है। ईद-उल-अजहा की नमाज के बाद ही बकरे की कुर्बानी दी जाती है। कुर्बानी के बकरे को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पहले भाग रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए होता है, वहीं दूसरा हिस्सा गरीब, जरूरतमंदों को दिया जाता है जबकि तीसरा परिवार के लिए होता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, 12वें महीने जु-अल-हिज्जा की 10 ता]रीख को बकरीद मनाई जाती है। यह तारीख रमजान के पवित्र महीने के खत्म होने के लगभग 70 दिनों के बाद आती है।

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, पैगंबर हजरत इब्राहिम ने अल्लाह की इबादत में खुद को समर्पित कर दिया था। एक बार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा ली और उनसे उनकी कीमती चीज की कुर्बानी मांगी। तब उन्होंने अपने बेटे हजरत इस्माइल को कुर्बानी देनी चाही। लेकिन तब अल्लाह ने पैगंबर हजरत इब्राहिम के बेटे की जगह वहां एक बकरे की कुर्बानी दिलवा दी। कहते हैं कि तब से ही मुसलमानों में बकरीद पर बकरे की कुर्बानी देनी की परंपरा शुरू हुई।

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